माता-पिता व वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007: ट्रिब्यूनल में आवेदन, ₹10,000 भरण-पोषण, बेदखली व संपत्ति सुरक्षा — हिंदी गाइड (2026)
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का कोई भी वरिष्ठ नागरिक — या कोई भी माता-पिता — जो अपनी आय या संपत्ति से स्वयं का भरण-पोषण नहीं कर सकता, अपने बच्चों या उत्तराधिकारी रिश्तेदारों के विरुद्ध उपखंड स्तर के भरण-पोषण ट्रिब्यूनल (SDM) में एक सादा आवेदन देकर हर माह ₹10,000 तक भरण-पोषण का दावा कर सकता है। इसके लिए वकील अनिवार्य नहीं है, कोर्ट फीस नाममात्र है, और ट्रिब्यूनल को आवेदन नोटिस तामील की तारीख से 90 दिन के भीतर निपटाना होता है (धारा 5(4))। यह दीवानी अदालत के भरण-पोषण मुकदमे से बहुत तेज़, सस्ता और सरल रास्ता है।
यह गाइड भारत में प्रैक्टिस करने वाले जूनियर वकीलों, विधि छात्रों और स्वयं आवेदन करने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए है — आवेदन कहाँ और कैसे दें, कितनी राशि व फीस, कौन-से दस्तावेज़, धारा 23 के तहत हड़पी गई संपत्ति वापस पाना, और किन हालात में बेटे या बहू को घर से बेदखल कराया जा सकता है।
एक नज़र में: मुख्य प्रावधान व सीमाएँ
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| धारा 4 | भरण-पोषण का अधिकार — जो वरिष्ठ नागरिक/माता-पिता स्वयं का भरण-पोषण नहीं कर सकते |
| धारा 7 – ट्रिब्यूनल | प्रत्येक उपखंड में गठित; अध्यक्ष SDM स्तर से नीचे का अधिकारी नहीं |
| धारा 9(2) – अधिकतम भरण-पोषण | ₹10,000 प्रति माह तक |
| धारा 5(4) – समय-सीमा | नोटिस तामील से 90 दिन में निपटारा (असाधारण स्थिति में एक बार 30 दिन तक बढ़ सकती) |
| धारा 5(2) – अंतरिम भरण-पोषण | कार्यवाही लंबित रहते मासिक अंतरिम राशि |
| धारा 15–16 – अपील | अपीलीय ट्रिब्यूनल = जिलाधिकारी (DM); आदेश से 60 दिन में अपील |
| धारा 23 – संपत्ति सुरक्षा | देखभाल की शर्त पर दी गई संपत्ति का हस्तांतरण शून्य घोषित हो सकता है |
| धारा 24 – परित्याग | 3 माह तक कारावास या ₹5,000 जुर्माना या दोनों |
(स्रोत: अधिनियम की मूल प्रति — indiacode.nic.in)
कौन आवेदन कर सकता है और किसके विरुद्ध?
धारा 4 के अनुसार, कोई भी माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक जो अपनी आय या स्वामित्व की संपत्ति से स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, अपने वयस्क बच्चों से — और संतानहीन होने पर संपत्ति के उत्तराधिकारी रिश्तेदार से — भरण-पोषण का हकदार है।
- वरिष्ठ नागरिक = 60 वर्ष या अधिक आयु का भारतीय नागरिक (धारा 2(h))।
- माता-पिता के मामले में 60 वर्ष की आयु ज़रूरी नहीं — जैविक, दत्तक या सौतेले माता-पिता भी शामिल (धारा 2(d))।
- "बच्चे" में पुत्र, पुत्री, पौत्र, पौत्री शामिल हैं (नाबालिग नहीं) — धारा 2(a)।
- आवेदन स्वयं वरिष्ठ नागरिक, या असमर्थ होने पर उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति/संगठन, या ट्रिब्यूनल स्वप्रेरणा (suo motu) से भी कर सकता है (धारा 5(1))।
"भरण-पोषण" में भोजन, वस्त्र, आवास तथा चिकित्सा उपचार व देखभाल शामिल है (धारा 2(b))।
ट्रिब्यूनल में आवेदन कैसे करें — चरण-दर-चरण
- सही ट्रिब्यूनल चुनें (धारा 6): आवेदन उस उपखंड के भरण-पोषण ट्रिब्यूनल में दें जहाँ वरिष्ठ नागरिक रहता है या अंतिम बार रहा, या जहाँ बच्चा/रिश्तेदार रहता है।
- सादा आवेदन तैयार करें: आवेदन में अपना विवरण, प्रतिवादी (बच्चे/रिश्तेदार) का विवरण, आय/संपत्ति की स्थिति, और माँगी गई मासिक राशि लिखें। अधिकांश राज्यों में निर्धारित प्रपत्र (Form) राज्य नियमों में दिया है।
- दाखिल करें: SDM कार्यालय/ट्रिब्यूनल में आवेदन जमा करें। कोर्ट फीस नाममात्र या शून्य है (राज्य-वार भिन्न)।
- नोटिस व सुनवाई: ट्रिब्यूनल प्रतिवादी को नोटिस भेजकर उपस्थिति सुनिश्चित करता है (धारा 8)। प्रक्रिया संक्षिप्त (summary) है और ट्रिब्यूनल को दीवानी अदालत की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- अंतरिम भरण-पोषण: सुनवाई लंबित रहते आप धारा 5(2) के तहत अंतरिम मासिक भरण-पोषण की माँग कर सकते हैं।
- आदेश: ट्रिब्यूनल 90 दिन के भीतर मासिक भरण-पोषण का आदेश देता है (धारा 5(4), 9)।
स्वप्रेरणा शक्ति: ट्रिब्यूनल स्वयं (suo motu) भी भरण-पोषण की कार्यवाही शुरू कर सकता है — यानी असहाय वरिष्ठ नागरिक के लिए किसी तीसरे पक्ष की शिकायत भी पर्याप्त है।
(धारा 5 का पूरा पाठ: Indian Kanoon — Section 5)
कितनी राशि और कितनी फीस लगती है?
ट्रिब्यूनल भरण-पोषण की राशि प्रतिवादी की आय और वरिष्ठ नागरिक की आवश्यकता को देखते हुए तय करता है, परंतु धारा 9(2) के तहत अधिकतम सीमा ₹10,000 प्रति माह है। यह BNSS की धारा 144 (पुरानी CrPC 125) के सामान्य भरण-पोषण से अलग है, जहाँ ऐसी कोई ऊपरी सीमा नहीं। इसलिए यदि आपको ₹10,000/माह से अधिक चाहिए, तो BNSS धारा 144 के तहत भरण-पोषण की सामान्य प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है — पर वह आमतौर पर धीमी होती है।
कोर्ट फीस अधिकांश राज्यों में शून्य या नाममात्र रखी गई है, क्योंकि अधिनियम का उद्देश्य असहाय बुज़ुर्गों को सस्ता व सुलभ उपाय देना है।
कितना समय लगता है?
ट्रिब्यूनल को आवेदन नोटिस तामील की तारीख से 90 दिन के भीतर निपटाना अनिवार्य है (धारा 5(4)); असाधारण परिस्थितियों में, कारण दर्ज करते हुए, यह अवधि एक बार अधिकतम 30 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। अपीलीय ट्रिब्यूनल (जिलाधिकारी) को अपील पर सुनवाई का अवसर देकर सामान्यतः एक माह में निर्णय देना होता है (धारा 16(6))। यही तेज़ी इस अधिनियम को दीवानी भरण-पोषण मुकदमे से बेहतर बनाती है।
कौन-से दस्तावेज़ चाहिए?
- आयु/पहचान प्रमाण (आधार, वोटर आईडी, पेंशन दस्तावेज़)।
- प्रतिवादी (बच्चे/रिश्तेदार) से संबंध का प्रमाण।
- आय व असमर्थता संबंधी विवरण — कि आप स्वयं का भरण-पोषण नहीं कर सकते।
- यदि संपत्ति हस्तांतरण का विवाद है, तो गिफ्ट डीड/हस्तांतरण विलेख की प्रति (धारा 23 के लिए)।
- उत्पीड़न/परित्याग के साक्ष्य (यदि बेदखली या परित्याग की भी माँग है)।
धारा 23 — हड़पी गई संपत्ति वापस पाना
धारा 23(1) के अनुसार, यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने इस शर्त पर अपनी संपत्ति (उपहार/गिफ्ट या अन्यथा) हस्तांतरित की कि हस्तांतरिती उसकी मूलभूत सुविधाएँ व देखभाल करेगा, और बाद में हस्तांतरिती ऐसा करने से मना कर दे या विफल रहे, तो वह हस्तांतरण कपट (fraud), बलपूर्वक या असम्यक् प्रभाव (undue influence) से किया गया माना जाएगा और ट्रिब्यूनल उसे शून्य घोषित कर सकता है।
यह प्रावधान उन माता-पिता के लिए सबसे शक्तिशाली हथियार है जिन्होंने भरोसे में आकर बेटे-बहू को मकान लिख दिया और बाद में उपेक्षित/बेघर कर दिए गए। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने माना है कि धारा 23 ऐसे बच्चों के विरुद्ध वृद्ध माता-पिता की संपत्ति की पर्याप्त सुरक्षा है।
क्या बेटे या बहू को घर से बेदखल कराया जा सकता है?
हाँ — लेकिन यह स्वचालित अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने एस. वनिता बनाम उपायुक्त, बेंगलुरु शहरी जिला, (2021) 15 SCC 730 में माना कि ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का आदेश देने की शक्ति है, बशर्ते वह वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण व संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक व समीचीन हो — बेदखली भरण-पोषण के अधिकार को लागू कराने का एक आनुषंगिक (incidental) उपाय है।
पर ध्यान दें: - बेदखली हर मामले में अनिवार्य नहीं। मार्च 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक माँ की बेटे को बेदखल करने की याचिका इसलिए ठुकरा दी क्योंकि लगातार उत्पीड़न के पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे — कोर्ट ने कहा कि "रहने की अनुमानित अनुमति (implied licence)" को उचित कारण के बिना वापस नहीं लिया जा सकता। - छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (जुलाई 2026) ने पुनः पुष्टि की कि आवश्यकता होने पर ट्रिब्यूनल बुज़ुर्ग की सुरक्षा हेतु बेटे/रिश्तेदार को बेदखल करने का आदेश दे सकता है। - यदि बहू घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत "साझा गृहस्थी" में रहने का अधिकार जताती है, तो ट्रिब्यूनल को दोनों अधिकारों में संतुलन बनाना होगा (एस. वनिता का सिद्धांत)।
निष्कर्ष: बेदखली माँगने के लिए उपेक्षा/उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य और यह दिखाना ज़रूरी है कि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा हेतु यही एकमात्र उपाय है।
अगर बच्चा भरण-पोषण आदेश का पालन न करे?
धारा 11 के तहत यदि प्रतिवादी बिना पर्याप्त कारण के आदेश का पालन नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल जुर्माने की भाँति राशि वसूल सकता है, और भुगतान न होने पर एक माह तक या भुगतान होने तक कारावास का वारंट जारी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक की देखभाल/संरक्षण के दायित्व के बावजूद उसे छोड़/परित्याग कर देता है, उसे धारा 24 के तहत तीन माह तक कारावास या ₹5,000 तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। ये अपराध संज्ञेय व जमानती हैं (धारा 25)।
वकील ज़रूरी है या खुद आवेदन कर सकते हैं?
धारा 17 के अनुसार, ट्रिब्यूनल या अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष कोई भी पक्ष विधि-व्यवसायी (वकील) द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता — ताकि प्रक्रिया सरल व सस्ती रहे। हालाँकि, दिल्ली उच्च न्यायालय (2021) और कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के तहत वकील का प्रैक्टिस का अधिकार धारा 17 से पूरी तरह नहीं छीना जा सकता — यानी व्यवहार में कई राज्यों/मामलों में वकील प्रतिनिधित्व की अनुमति है। सीधा-सादा भरण-पोषण आवेदन स्वयं दायर किया जा सकता है; संपत्ति/बेदखली जैसे जटिल विवादों में वकील की मदद लेना बेहतर है।
यदि आपको किसी प्रतिकूल आदेश की आशंका है (जैसे बच्चे संपत्ति बेच सकते हैं), तो सिविल कोर्ट में कैविएट याचिका (धारा 148A CPC) दायर करने की प्रक्रिया भी उपयोगी हो सकती है।
Urava किस तरह मदद करता है
वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण जैसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती है — सही धारा, ताज़ा केस-लॉ (जैसे एस. वनिता) और राज्य नियमों को जल्दी जुटाना। Urava भारतीय कानून पर केंद्रित एक AI लीगल-रिसर्च टूल है जो टाइप किए गए प्रश्न या स्कैन किए गए दस्तावेज़ (मलयालम/हिंदी/अंग्रेज़ी OCR) से लगभग 10 मिनट में उद्धरण-सहित (citation-backed), कोर्ट-रेडी रिसर्च मेमो (PDF) तैयार करता है — WhatsApp पर। जूनियर वकील इसका उपयोग AI से कानूनी शोध कैसे करें की तरह भरण-पोषण, धारा 23 व बेदखली पर सटीक मेमो बनाने के लिए कर सकते हैं। मुफ़्त में शुरू करें — urava.app/register पर 3 निःशुल्क रिसर्च।
अस्वीकरण: यह सामग्री सामान्य जानकारी के लिए है, विधिक सलाह नहीं। अपने मामले के तथ्यों के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श लें।
Frequently Asked Questions
क्या वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण के लिए वकील करना ज़रूरी है?
नहीं, वकील अनिवार्य नहीं है। धारा 17 के अनुसार ट्रिब्यूनल के समक्ष पक्ष सामान्यतः वकील द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं करते, ताकि प्रक्रिया सरल व सस्ती रहे। हालाँकि दिल्ली व कर्नाटक उच्च न्यायालयों ने अधिवक्ता अधिनियम की धारा 30 के आधार पर वकील प्रतिनिधित्व की अनुमति दी है। सीधा आवेदन स्वयं दायर किया जा सकता है; जटिल संपत्ति/बेदखली विवादों में वकील की मदद लाभकारी है।
भरण-पोषण ट्रिब्यूनल अधिकतम कितनी राशि दे सकता है?
ट्रिब्यूनल धारा 9(2) के तहत अधिकतम ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण का आदेश दे सकता है। वास्तविक राशि प्रतिवादी की आय और वरिष्ठ नागरिक की आवश्यकता को देखते हुए तय होती है। यदि इससे अधिक चाहिए, तो BNSS धारा 144 (पुरानी CrPC 125) के तहत सामान्य भरण-पोषण का विकल्प है, जहाँ कोई ऊपरी सीमा नहीं, पर प्रक्रिया धीमी होती है।
क्या ट्रिब्यूनल बेटे या बहू को घर से बेदखल कर सकता है?
हाँ, पर हर मामले में नहीं। एस. वनिता बनाम उपायुक्त (2021) 15 SCC 730 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बुज़ुर्ग के संरक्षण हेतु आवश्यक होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। परंतु 2025 में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेदखली स्वचालित नहीं — उपेक्षा/उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य और यह दिखाना ज़रूरी है कि सुरक्षा हेतु यही एकमात्र उपाय है।
आवेदन का निपटारा कितने दिन में होना चाहिए?
ट्रिब्यूनल को धारा 5(4) के तहत आवेदन नोटिस तामील की तारीख से 90 दिन के भीतर निपटाना अनिवार्य है। असाधारण परिस्थितियों में, कारण दर्ज करते हुए, यह अवधि एक बार अधिकतम 30 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। सुनवाई लंबित रहते वरिष्ठ नागरिक धारा 5(2) के तहत अंतरिम मासिक भरण-पोषण भी माँग सकते हैं।
अगर बच्चे भरण-पोषण आदेश का पालन न करें तो क्या होगा?
यदि प्रतिवादी बिना पर्याप्त कारण आदेश का पालन नहीं करता, तो धारा 11 के तहत ट्रिब्यूनल जुर्माने की भाँति राशि वसूल सकता है और भुगतान न होने पर एक माह तक कारावास का वारंट जारी कर सकता है। वरिष्ठ नागरिक को छोड़ने/परित्याग करने पर धारा 24 के तहत तीन माह तक कारावास या ₹5,000 जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।