घरेलू हिंसा अधिनियम धारा 12: मजिस्ट्रेट में आवेदन कैसे करें — DIR, Form II, राहत, 60-दिन समय-सीमा व अपील (2026 हिंदी गाइड)
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) की धारा 12 के तहत अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (या महानगर मजिस्ट्रेट) के समक्ष Form II में आवेदन दायर करके संरक्षण आदेश, निवास आदेश, भरण-पोषण और मुआवज़ा — एक ही आवेदन में — माँग सकती है। आवेदन स्वयं महिला, संरक्षण अधिकारी (Protection Officer) या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति दायर कर सकता है, इसके लिए किसी FIR की ज़रूरत नहीं होती, और अधिनियम मजिस्ट्रेट से अपेक्षा करता है कि पहली सुनवाई से 60 दिन के भीतर मामले का निपटारा हो।
यह पूरी हिंदी गाइड बताती है कि आवेदन कौन, कहाँ और कैसे दायर करे, Domestic Incident Report (DIR) क्या है, कौन-कौन सी राहतें माँगी जा सकती हैं, कितना समय व खर्च लगता है, समय-सीमा (limitation) का नियम, और आदेश के खिलाफ अपील का तरीका।
धारा 12 का आवेदन एक दीवानी प्रकृति की अर्ज़ी है जिसमें एक ही अर्ज़ी के ज़रिए महिला अधिनियम की धारा 18 से 22 तक की सभी राहतें — संरक्षण, निवास, भरण-पोषण, अभिरक्षा और मुआवज़ा — एक साथ माँग सकती है।
धारा 12 के तहत मिलने वाली राहतें — एक नज़र में
| धारा | राहत | क्या मिल सकता है |
|---|---|---|
| धारा 18 | संरक्षण आदेश (Protection Order) | प्रतिवादी को हिंसा, संपर्क, कार्यस्थल पर जाने या साझा घर से बेदखल करने से रोकना |
| धारा 19 | निवास आदेश (Residence Order) | साझा घर (shared household) में रहने का अधिकार; प्रतिवादी द्वारा बेदखली पर रोक; वैकल्पिक आवास/किराया |
| धारा 20 | मौद्रिक राहत (Monetary Relief) | भरण-पोषण, आय की हानि, चिकित्सा खर्च, संपत्ति क्षति की भरपाई |
| धारा 21 | अभिरक्षा आदेश (Custody Order) | बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा |
| धारा 22 | मुआवज़ा आदेश (Compensation) | मानसिक व शारीरिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति |
| धारा 23 | अंतरिम व एकपक्षीय आदेश | सुनवाई पूरी होने से पहले तुरंत अंतरिम राहत / ex-parte आदेश |
धारा 12 आवेदन कौन दायर कर सकता है
"पीड़ित व्यक्ति" (aggrieved person) का अर्थ है ऐसी कोई महिला जो प्रतिवादी के साथ घरेलू संबंध (domestic relationship) में है या रही है और जिसके साथ प्रतिवादी ने घरेलू हिंसा की है — इसमें पत्नी, लिव-इन साथी, माँ, बहन, बेटी और बहू शामिल हैं। आवेदन स्वयं पीड़ित महिला, कोई संरक्षण अधिकारी, या पीड़िता की ओर से कोई अन्य व्यक्ति (जैसे रिश्तेदार, वकील या सेवा प्रदाता) दायर कर सकता है।
प्रतिवादी कौन हो सकता है? पहले धारा 2(q) में "वयस्क पुरुष" (adult male) की शर्त थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने हिरल पी. हरसोरा बनाम कुसुम नरोत्तमदास हरसोरा (2016, AIR 2016 SC 4774) में यह शब्द रद्द कर दिए — अब सास, ननद या घर की अन्य महिला सदस्यों के विरुद्ध भी शिकायत की जा सकती है।
आवेदन कहाँ और किसके समक्ष दायर करें (क्षेत्राधिकार — धारा 27)
धारा 27 के अनुसार आवेदन वहाँ के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी या महानगर मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर होता है जहाँ (क) पीड़िता रहती है (स्थायी या अस्थायी) या काम करती है, (ख) प्रतिवादी रहता या काम करता है, या (ग) जहाँ घटना (cause of action) घटी। दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आवेदन केवल क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष ही सुनवाई-योग्य है — इसलिए सही कोर्ट चुनना ज़रूरी है।
आवेदन की प्रक्रिया — चरण-दर-चरण
- संरक्षण अधिकारी / सेवा प्रदाता से संपर्क (वैकल्पिक पर उपयोगी): पीड़िता सीधे मजिस्ट्रेट के पास जा सकती है, या पहले ज़िले के संरक्षण अधिकारी (Protection Officer) से संपर्क कर सकती है, जिसकी सेवा निःशुल्क है।
- Domestic Incident Report (DIR) — Form I: संरक्षण अधिकारी या सेवा प्रदाता घटना का विवरण DIR (Form I) में दर्ज करता है और मजिस्ट्रेट को भेजता है। मजिस्ट्रेट आदेश देते समय DIR पर विचार करता है। ध्यान दें — सुप्रीम कोर्ट ने प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी (2022, LiveLaw SC 474) में माना कि साझा घर में रहने का अधिकार तब भी है जब महिला वहाँ वास्तव में रह न रही हो।
- आवेदन तैयार करना — Form II: धारा 12 का आवेदन घरेलू हिंसा नियम, 2006 के Form II में तैयार होता है, जिसमें पक्षकारों का विवरण, घरेलू संबंध, हिंसा का विवरण और माँगी जा रही राहतें (धारा 18–22) लिखी जाती हैं।
- दायर करना व नोटिस: आवेदन मजिस्ट्रेट कोर्ट में दायर होता है; कोर्ट प्रतिवादी को नोटिस भेजता है (संरक्षण अधिकारी के माध्यम से 2 दिन के भीतर तामील का प्रयास)।
- पहली सुनवाई (धारा 12(4)): मजिस्ट्रेट पहली सुनवाई की तारीख तय करता है, जो सामान्यतः आवेदन प्राप्ति से 3 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- अंतरिम राहत (धारा 23): पहली सुनवाई में ही मजिस्ट्रेट अंतरिम या एकपक्षीय (ex-parte) आदेश दे सकता है — जैसे तुरंत बेदखली पर रोक या अंतरिम भरण-पोषण।
- साक्ष्य व अंतिम आदेश: दोनों पक्ष अपने साक्ष्य/शपथपत्र प्रस्तुत करते हैं; मजिस्ट्रेट धारा 12(5) के तहत पहली सुनवाई से 60 दिन के भीतर निपटारे का प्रयास करता है (यह लक्ष्य है, बाध्यता नहीं)।
घरेलू हिंसा में भरण-पोषण (धारा 20) बनाम धारा 125 CrPC / BNSS 144
धारा 20 के तहत माँगा गया भरण-पोषण धारा 125 CrPC (अब BNSS की धारा 144) या अन्य किसी कानून के तहत मिलने वाले भरण-पोषण के अतिरिक्त है, उसके विरोध में नहीं। यानी एक महिला DV Act में भी भरण-पोषण माँग सकती है और अलग से धारा 125/BNSS 144 में भी — पर अदालतें दोहरे भुगतान से बचने के लिए राशि का समायोजन करती हैं। भरण-पोषण की राशि तय करते समय अदालत रजनेश बनाम नेहा (2020) के दिशानिर्देशों के अनुसार दोनों पक्षों से आय व संपत्ति का शपथपत्र माँगती है। भारत में माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण-पोषण की एक समानांतर, तेज़ व्यवस्था भी है — इसकी पूरी प्रक्रिया हमारी गाइड वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007: ट्रिब्यूनल में आवेदन व बेदखली में देखें।
कितना समय लगता है और कितना खर्च आता है?
घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के आवेदन पर अधिनियम कोई कोर्ट फीस निर्धारित नहीं करता — यह एक लाभकारी (beneficial) कानून है और संरक्षण अधिकारी की सहायता निःशुल्क है; वकील की फीस अलग से लगती है। अधिनियम 60 दिन में निपटारे का लक्ष्य रखता है, परंतु व्यवहार में अंतरिम आदेश कुछ हफ़्तों-महीनों में और अंतिम आदेश प्रायः 1–3 वर्ष में आते हैं, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर अदालतों में 4.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं (NJDG)। अगर आप वकील का खर्च नहीं उठा सकतीं तो ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से निःशुल्क कानूनी सहायता ली जा सकती है।
ज़रूरी दस्तावेज़
- पहचान व पते का प्रमाण (आधार/वोटर आईडी)
- विवाह/घरेलू संबंध का प्रमाण (विवाह प्रमाणपत्र, फोटो, संयुक्त दस्तावेज़)
- घरेलू हिंसा के साक्ष्य (चोट की मेडिकल रिपोर्ट, फोटो, मैसेज/कॉल रिकॉर्ड, गवाहों के नाम)
- साझा घर व संपत्ति के दस्तावेज़ (किराया/मालिकाना, बिजली-पानी बिल)
- आय/खर्च का ब्योरा (भरण-पोषण हेतु — रजनेश बनाम नेहा शपथपत्र)
- पहले की कोई शिकायत/FIR की प्रति (यदि हो)
क्या कोई समय-सीमा (Limitation) है?
सुप्रीम कोर्ट ने कमाची बनाम लक्ष्मी नारायणन (2022 INSC 421 / LiveLaw SC 370) में स्पष्ट किया कि धारा 468 CrPC की एक वर्ष की समय-सीमा धारा 12 के आवेदन पर लागू नहीं होती, क्योंकि यह आवेदन CrPC के अर्थ में "complaint" नहीं है। समय-सीमा केवल धारा 31 के दंडात्मक (penal) मामलों पर लागू होती है, जहाँ संरक्षण आदेश के उल्लंघन की सज़ा माँगी जाती है। इसलिए हिंसा की घटना पुरानी होने मात्र से धारा 12 का आवेदन खारिज नहीं होता।
आदेश के खिलाफ अपील — धारा 29
धारा 29 के अनुसार मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय (Court of Session) में 30 दिन के भीतर अपील की जा सकती है — यह अवधि आदेश की तामील पीड़िता या प्रतिवादी (जो भी बाद में हो) पर होने की तारीख से गिनी जाती है। यह उपाय दोनों पक्षों के लिए उपलब्ध है।
आदेश का उल्लंघन हो तो — धारा 31
धारा 31 के तहत संरक्षण आदेश या अंतरिम संरक्षण आदेश का उल्लंघन एक अपराध है, जिसकी सज़ा एक वर्ष तक का कारावास, या ₹20,000 तक जुर्माना, या दोनों हो सकती है; यह अपराध संज्ञेय (cognizable) और गैर-ज़मानती (non-bailable) है। उल्लंघन की शिकायत उसी मजिस्ट्रेट के समक्ष की जाती है जिसने आदेश पारित किया था।
किन गलतियों से केस कमज़ोर होता है — और कब वकील ज़रूरी है
- गलत क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर करना (धारा 27 देखें)।
- Form II में हिंसा का अस्पष्ट/तारीख-रहित विवरण; ठोस घटनाओं व साक्ष्य के बिना राहत कमज़ोर पड़ती है।
- अंतरिम राहत (धारा 23) की स्पष्ट माँग न करना — जिससे प्रारंभिक सुरक्षा छूट जाती है।
- यदि साथ में क्रूरता/दहेज़ की आपराधिक शिकायत भी हो और पुलिस FIR दर्ज न करे, तो सही प्रक्रिया न जानना — ऐसे में देखें पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें — BNSS धारा 175(3)। दूसरी ओर, यदि प्रतिवादी (पति/ससुराल) के विरुद्ध आपराधिक मामला बनता है, तो वे BNSS धारा 482 अग्रिम ज़मानत का सहारा ले सकते हैं।
सरल, बिना विवाद वाले मामलों में महिला स्वयं या संरक्षण अधिकारी की मदद से आवेदन दे सकती है; परंतु जहाँ संपत्ति/निवास का विवाद, बच्चों की अभिरक्षा, या समानांतर आपराधिक/तलाक कार्यवाही हो, वहाँ अनुभवी वकील की मदद लेना उचित है।
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अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। अपने मामले के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श करें।
Frequently Asked Questions
घरेलू हिंसा अधिनियम धारा 12 में आवेदन कौन दायर कर सकता है?
धारा 12 के तहत आवेदन स्वयं पीड़ित महिला, ज़िले का संरक्षण अधिकारी, या पीड़िता की ओर से कोई अन्य व्यक्ति (रिश्तेदार, वकील या सेवा प्रदाता) दायर कर सकता है। इसके लिए FIR दर्ज कराना ज़रूरी नहीं है। पीड़ित महिला में पत्नी, लिव-इन साथी, माँ, बहन, बेटी और बहू शामिल हैं।
धारा 12 आवेदन का निपटारा कितने दिन में होता है?
अधिनियम की धारा 12(5) मजिस्ट्रेट से अपेक्षा करती है कि पहली सुनवाई की तारीख से 60 दिन के भीतर आवेदन का निपटारा हो। पहली सुनवाई स्वयं धारा 12(4) के तहत आवेदन प्राप्ति से सामान्यतः 3 दिन के भीतर तय होती है। व्यवहार में अंतरिम आदेश जल्दी और अंतिम आदेश प्रायः 1–3 वर्ष में आते हैं।
क्या घरेलू हिंसा का केस दायर करने की कोई समय-सीमा है?
नहीं, धारा 12 के आवेदन पर धारा 468 CrPC की एक वर्ष की समय-सीमा लागू नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने कमाची बनाम लक्ष्मी नारायणन (2022) में यह तय किया, क्योंकि धारा 12 का आवेदन CrPC के अर्थ में "complaint" नहीं है। समय-सीमा केवल धारा 31 के दंडात्मक मामलों पर लागू होती है।
धारा 12 आवेदन में कोर्ट फीस कितनी लगती है?
घरेलू हिंसा अधिनियम धारा 12 के आवेदन पर अधिनियम कोई कोर्ट फीस निर्धारित नहीं करता, और संरक्षण अधिकारी की सहायता निःशुल्क है। वकील की फीस अलग से लगती है। यदि आप खर्च नहीं उठा सकतीं, तो ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध है।
मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ अपील कहाँ करें?
धारा 29 के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय (Court of Session) में अपील की जाती है। अपील आदेश की तामील पीड़िता या प्रतिवादी (जो भी बाद में हो) पर होने की तारीख से 30 दिन के भीतर दायर करनी होती है। यह उपाय दोनों पक्षों के लिए उपलब्ध है।