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पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? BNSS धारा 173(4) और 175(3) का पूरा तरीका — हिंदी गाइड (2026)

8 July 2026 · Urava Research Desk

पुलिस FIR दर्ज करने से मना करे तो कानून आपको तीन क्रमबद्ध उपाय देता है: पहले थाना प्रभारी (SHO) को लिखित शिकायत दें (BNSS धारा 173(1)), वहाँ न सुनी जाए तो उसी शिकायत की प्रति पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजें (BNSS धारा 173(4)), और फिर भी FIR न हो तो हलफनामे के साथ न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष BNSS धारा 175(3) में आवेदन करें — मजिस्ट्रेट पुलिस को FIR दर्ज कर जाँच का आदेश दे सकता है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 ने यह क्रम अनिवार्य बना दिया है, इसलिए सीधे मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट जाने से पहले SP वाला चरण पूरा करना ज़रूरी है।

संज्ञेय (cognizable) अपराध की सूचना मिलते ही FIR दर्ज करना पुलिस का कानूनी कर्तव्य है, विवेक (discretion) का विषय नहीं — यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (12 नवम्बर 2013, (2014) 2 SCC 1, indiankanoon.org/doc/10239019) में तय किया था; BNSS धारा 173(1) में भी वही "shall" (करेगा) शब्द बना हुआ है।

यह गाइड जूनियर वकीलों, litigants और आम नागरिकों के लिए है, जिन्हें थाने से "बाद में आना", "यह हमारा इलाका नहीं" या "मामला सिविल है" जैसे जवाब मिलते हैं। नीचे हर चरण, ज़रूरी दस्तावेज़, समय-सीमा, खर्च और 2025 का ताज़ा सुप्रीम कोर्ट फैसला क्रम से दिया गया है।

पहले समझें: कौन-सा अपराध, कौन-सी धारा

संज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के FIR दर्ज कर गिरफ्तारी और जाँच कर सकती है (जैसे चोरी, मारपीट से गंभीर चोट, बलात्कार, धोखाधड़ी, दहेज उत्पीड़न)। ऐसे मामलों में FIR दर्ज करना पुलिस के लिए बाध्यकारी है।

असंज्ञेय (non-cognizable) अपराध (जैसे मामूली गाली-गलौज, साधारण मारपीट) में पुलिस सीधे FIR नहीं, बल्कि रजिस्टर में entry करके आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है — वहाँ 175(3) का सीधा उपाय अलग तरह से लागू होता है।

BNSS की एक नई सुविधा: धारा 173(1) के तहत अब "Zero FIR" वैधानिक अधिकार है — किसी भी थाने में, चाहे अपराध उसके इलाके में हुआ हो या नहीं, FIR दर्ज करानी होगी और बाद में सम्बंधित थाने को स्थानांतरित की जाएगी। साथ ही e-FIR (electronic माध्यम से सूचना) की व्यवस्था भी है। इसलिए "यह हमारा क्षेत्र नहीं" अब FIR न लिखने का वैध कारण नहीं है।

एक और बदलाव: BNSS धारा 173(3) के तहत 3 से 7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस, उपाधीक्षक (DSP) रैंक के अधिकारी की अनुमति से, 14 दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच (preliminary enquiry) कर सकती है कि प्रथम-दृष्टया मामला बनता है या नहीं। यह देरी वैध है, इनकार नहीं।

तीन-चरण प्रक्रिया — एक नज़र में

चरण किसके पास कानूनी आधार क्या करें
1 थाना प्रभारी (SHO) BNSS 173(1) लिखित शिकायत दें, पावती (receipt) लें
2 पुलिस अधीक्षक (SP) BNSS 173(4) रजिस्टर्ड डाक/ईमेल से शिकायत की प्रति भेजें
3 न्यायिक मजिस्ट्रेट BNSS 175(3) हलफनामे के साथ आवेदन दाखिल करें
आगे हाईकोर्ट संविधान अनुच्छेद 226/227 असाधारण स्थिति में रिट/पुनरीक्षण

चरण 1 — थाना प्रभारी (SHO) को लिखित शिकायत

मौखिक शिकायत पर टालमटोल होने पर एक लिखित शिकायत दें जिसमें घटना की तारीख, समय, स्थान, आरोपी और घटनाक्रम स्पष्ट हो। दो प्रति बनाएँ — एक थाने में जमा करें, दूसरी पर पावती मुहर और तारीख लगवा लें। यही पावती आगे के चरणों में आपका सबसे मज़बूत सबूत है कि आपने पहले पुलिस से संपर्क किया था। अगर थाना पावती देने से भी मना करे, तो शिकायत रजिस्टर्ड डाक (AD) या ईमेल से भेजें ताकि तारीख का प्रमाण रहे।

चरण 2 — पुलिस अधीक्षक (SP) को आवेदन: BNSS धारा 173(4)

SHO के इनकार के बाद, उसी लिखित शिकायत की प्रति पुलिस अधीक्षक को भेजें। धारा 173(4) कहती है कि यदि SP को लगे कि सूचना संज्ञेय अपराध बताती है, तो वह या तो स्वयं जाँच करेगा या अपने अधीनस्थ अधिकारी को FIR दर्ज कर जाँच का निर्देश देगा।

यह चरण अब वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य पूर्व-शर्त है: मजिस्ट्रेट के पास 175(3) में जाने से पहले SP को आवेदन देना और उसका प्रमाण रखना कानूनन आवश्यक है — यही BNSS को पुराने CrPC से अलग करता है।

SP को आवेदन भी रजिस्टर्ड डाक/ईमेल से भेजें और भेजने का प्रमाण (डाक रसीद/डिलीवरी रिपोर्ट/ईमेल) सुरक्षित रखें। व्यवहार में SP कार्यालय अक्सर मामला वापस उसी थाने भेज देता है — फिर भी यह चरण दस्तावेज़ी रूप से पूरा करना ज़रूरी है, क्योंकि इसकी प्रति और हलफनामा तीसरे चरण में लगेगा।

चरण 3 — मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 175(3) आवेदन (हलफनामा अनिवार्य)

SP से भी संतोषजनक कार्रवाई न होने पर, क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष BNSS धारा 175(3) में आवेदन दें। यह धारा पुराने CrPC की धारा 156(3) की जगह आई है, पर इसमें दो नई शर्तें जुड़ी हैं जो हर आवेदक को पता होनी चाहिए:

  1. हलफनामा (affidavit) अनिवार्य: आवेदन के साथ यह शपथ-पत्र देना होगा कि आपने पहले SHO और फिर SP (173(4)) को शिकायत दी थी — यानी दोनों पिछले चरणों के पालन का सबूत।
  2. पुलिस का पक्ष सुनना: आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को FIR दर्ज न करने के कारण पर सम्बंधित पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनना और आवश्यक हो तो स्वयं जाँच (inquiry) करना ज़रूरी है।

सुप्रीम कोर्ट (2025): ओम प्रकाश अम्बादकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (16 जनवरी 2025, 2025 INSC 139, indiankanoon.org/doc/141233097, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला व आर. महादेवन) ने स्पष्ट किया कि CrPC 156(3) के विपरीत BNSS 175(3) में मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी के तर्क विचार में लेने होंगे, तर्कसंगत (reasoned) आदेश देना होगा, और आदेश यंत्रवत (mechanically) नहीं दिया जा सकता। जहाँ शिकायतकर्ता स्वयं सबूत जुटा सकता है, वहाँ 175(3) का सहारा सतर्कता से मिलेगा।

यानी 175(3) का आवेदन अब औपचारिकता नहीं — इसे सही दस्तावेज़ों और तर्क के साथ तैयार करना पड़ता है, वरना खारिज होने का जोखिम है।

175(3) आवेदन में कौन-कौन से दस्तावेज़ लगेंगे

कितना समय और कितना खर्च आता है

खर्च: 175(3) का आवेदन स्वयं देने पर लागत बहुत कम है — मुख्यतः हलफनामे का स्टाम्प व नोटरी शुल्क (कुछ सौ रुपये)। वकील के माध्यम से देने पर फीस स्थान व अनुभव के अनुसार भिन्न होती है। SHO और SP को शिकायत भेजने में केवल रजिस्टर्ड डाक का खर्च आता है।

समय: चरण 1 और 2 आप कुछ ही दिनों में पूरे कर सकते हैं। SP को उचित समय (सामान्यतः 1–2 सप्ताह) देने के बाद ही मजिस्ट्रेट जाना बेहतर होता है, क्योंकि मजिस्ट्रेट पूछेगा कि पिछले चरण कब पूरे हुए। मजिस्ट्रेट का आदेश आने में कुछ सुनवाइयाँ लग सकती हैं, क्योंकि अब पुलिस का पक्ष सुनना अनिवार्य है।

अगर मजिस्ट्रेट भी आदेश न दे या देरी हो

मजिस्ट्रेट के इनकार पर पहला रास्ता पुनरीक्षण (revision) सत्र न्यायालय/हाईकोर्ट में है। सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 की रिट याचिका आमतौर पर तब पोषणीय नहीं मानी जाती जब 175(3) का सामान्य उपाय उपलब्ध हो — कई हाईकोर्टों ने यही कहा है कि पहले मजिस्ट्रेट का उपाय आज़माना होगा। इसलिए क्रम का पालन ज़रूरी है; चरण छोड़ने पर याचिका खारिज हो सकती है।

वकील की ज़रूरत कब, और खुद कब कर सकते हैं

चरण 1 और 2 (SHO व SP को लिखित शिकायत) आप स्वयं कर सकते हैं — इनके लिए वकील अनिवार्य नहीं। चरण 3 का 175(3) आवेदन तकनीकी है: सही धारा, हलफनामे की भाषा, और पुलिस के संभावित तर्कों का जवाब मायने रखते हैं, इसलिए यहाँ वकील की मदद लेना समझदारी है — खासकर 2025 के सुप्रीम कोर्ट मानक के बाद, जहाँ तर्कसंगत, सबूत-समर्थित आवेदन ही टिकते हैं। सम्बंधित प्रक्रियाओं के लिए हमारी BNSS धारा 528 में FIR रद्द (quash) कराने की हिंदी गाइड और BNSS धारा 482 अग्रिम जमानत की हिंदी गाइड भी देखें; आपराधिक प्रक्रिया के पूरे समूह के लिए BNSS धारा 480 जमानत-शर्त संशोधन गाइड हमारा criminal-procedure hub है।

Urava कैसे मदद करता है

Urava भारतीय कानून के लिए बनाया गया AI लीगल-रिसर्च टूल है, जो टाइप किए गए सवाल या स्कैन किए गए दस्तावेज़ (मलयालम/हिंदी/अंग्रेज़ी OCR) से लगभग 10 मिनट में उद्धरण-समर्थित, कोर्ट-रेडी रिसर्च मेमो (PDF) तैयार करता है। FIR-इनकार जैसे मामले में यह BNSS 173(4)/175(3) की सही धाराएँ, ताज़ा फैसले और आवेदन का ढाँचा एक जगह जुटा देता है — ताकि जूनियर वकील मिनटों में मसौदा तैयार कर सकें। WhatsApp पर काम करता है, मुफ़्त शुरुआत के साथ। urava.app पर मुफ़्त रजिस्टर करें और पहली 3 रिसर्च निःशुल्क आज़माएँ।

Frequently Asked Questions

पुलिस FIR दर्ज न करे तो सबसे पहले क्या करना चाहिए?

सबसे पहले थाना प्रभारी (SHO) को एक लिखित शिकायत दें और उस पर पावती (मुहर व तारीख) लें। पावती न मिले तो रजिस्टर्ड डाक या ईमेल से भेजें ताकि प्रमाण रहे। यह BNSS धारा 173(1) के तहत पहला और अनिवार्य कदम है, जिसके बिना आगे SP और मजिस्ट्रेट का रास्ता कमज़ोर पड़ जाता है।

BNSS धारा 175(3) में मजिस्ट्रेट को आवेदन कैसे देते हैं?

क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष एक आवेदन दें जिसके साथ हलफनामा लगाना अनिवार्य है, यह दिखाते हुए कि आपने पहले SHO और फिर पुलिस अधीक्षक (173(4)) को शिकायत दी थी। साथ में शिकायतों की प्रतियाँ, डाक रसीदें और उपलब्ध सबूत लगाएँ। मजिस्ट्रेट पुलिस का पक्ष सुनकर FIR दर्ज कर जाँच का आदेश दे सकता है।

क्या धारा 175(3) में हलफनामा देना ज़रूरी है?

हाँ, BNSS धारा 175(3) में मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन के साथ हलफनामा देना अनिवार्य है। इसी हलफनामे में यह शपथ लेनी होती है कि आपने पहले थाना प्रभारी और फिर पुलिस अधीक्षक को धारा 173(4) के तहत शिकायत दी थी। यह शर्त पुराने CrPC की धारा 156(3) में नहीं थी और BNSS में नई जोड़ी गई है।

क्या SP को आवेदन दिए बिना सीधे मजिस्ट्रेट जा सकते हैं?

सामान्यतः नहीं। BNSS 175(3) का उपाय तभी मज़बूत होता है जब आप पहले धारा 173(4) में पुलिस अधीक्षक को आवेदन दे चुके हों और उसका प्रमाण हलफनामे के साथ दें। यह पूर्व-शर्त अनिवार्य मानी जाती है, इसलिए यह चरण छोड़ने पर मजिस्ट्रेट आवेदन खारिज कर सकता है।

क्या FIR दर्ज न होने पर सीधे हाईकोर्ट में रिट दायर कर सकते हैं?

आमतौर पर नहीं, क्योंकि जब BNSS धारा 175(3) का सामान्य उपाय उपलब्ध है तो अनुच्छेद 226 की रिट याचिका पोषणीय नहीं मानी जाती। कई हाईकोर्टों ने कहा है कि पहले मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा। असाधारण परिस्थितियों में ही हाईकोर्ट सीधे हस्तक्षेप करता है।

ओम प्रकाश अम्बादकर फैसले ने क्या बदला?

ओम प्रकाश अम्बादकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025 INSC 139) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि BNSS 175(3) के तहत आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी के तर्क सुनने और तर्कसंगत आदेश देने होंगे। यंत्रवत आदेश नहीं चलेगा, और जहाँ शिकायतकर्ता स्वयं सबूत जुटा सकता है वहाँ 175(3) सतर्कता से लागू होगा।

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