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न्यायालय से निर्णय/आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) कैसे प्राप्त करें — भारत में: प्रतिलिपि अनुभाग (Copying Section) में आवेदन, फीस, साधारण बनाम अर्जेंट (tatkal), eCourts ऑनलाइन, और अपील की समय-सीमा प्रमाणित प्रति से क्यों शुरू होती है (Limitation Act धारा 12) — 2026 हिंदी गाइड

4 November 2026 · Urava Research Desk

निर्णय या आदेश की प्रमाणित प्रति (certified copy) पाने के लिए उसी न्यायालय की प्रतिलिपि शाखा (Copying Section) में एक सादा आवेदन दें, जिसमें केस नंबर, पक्षकारों के नाम और आदेश की तारीख लिखी हो, निर्धारित प्रतिलिपि-शुल्क (प्रायः ₹2–₹10 प्रति पृष्ठ) कोर्ट-फीस स्टाम्प/चालान के रूप में जमा करें, और साधारण या अर्जेंट (tatkal) प्रति में से चुनें। साधारण प्रति कुछ दिनों से एक-दो सप्ताह में और अर्जेंट प्रति प्रायः उसी या अगले दिन मिल जाती है। कई उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में अब यह आवेदन eCourts/ऑनलाइन पोर्टल से भी किया जा सकता है और डिजिटली हस्ताक्षरित PDF डाउनलोड हो जाती है।

प्रमाणित प्रति किसी न्यायालय के निर्णय या आदेश की वह आधिकारिक नकल है, जिस पर न्यायालय की मुहर और प्रतिलिपि-अधिकारी के हस्ताक्षर के साथ यह प्रमाण-पत्र होता है कि यह मूल की सही प्रति है — केवल यही अपील, निष्पादन और साक्ष्य के लिए न्यायालय में स्वीकार्य होती है, साधारण फोटोकॉपी या प्रिंटआउट नहीं।

प्रमाणित प्रति क्या है और यह क्यों ज़रूरी है

न्यायालय का निर्णय एक "लोक दस्तावेज़" (public document) है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 76/77 को अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam), 2023 की धारा 75 व 76 ने प्रतिस्थापित कर दिया है (लागू: 1 जुलाई 2024)। धारा 75 के अनुसार जिस लोक अधिकारी के पास दस्तावेज़ की अभिरक्षा है और जिसे देखने का किसी व्यक्ति को अधिकार है, वह अधिकारी माँगने पर, निर्धारित विधिक शुल्क (legal fees) देने पर, उसकी प्रति देगा और नीचे यह प्रमाण-पत्र लगाएगा कि यह सही प्रति है, तारीख व अपने नाम-पद सहित हस्ताक्षरित और (जहाँ विधि अनुमति दे) मुहरबंद। धारा 76 कहती है कि ऐसी प्रमाणित प्रति ही मूल दस्तावेज़ की विषय-वस्तु सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत की जा सकती है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि अपील, पुनरीक्षण (revision), निष्पादन (execution) या किसी अन्य न्यायालय में प्रमाण के लिए आपको प्रमाणित प्रति ही चाहिए — वेबसाइट से डाउनलोड किया गया साधारण प्रिंटआउट या वकील की फाइल की फोटोकॉपी पर्याप्त नहीं। ध्यान रहे, प्रमाणित प्रति पाने का अधिकार उस दस्तावेज़ को "देखने के अधिकार" पर निर्भर करता है; पक्षकार और उनके अधिवक्ता अपने केस के निर्णय/आदेश की प्रति के स्वाभाविक हकदार हैं।

कहाँ और कैसे आवेदन करें — प्रतिलिपि अनुभाग (Copying Section)

आवेदन उसी न्यायालय में होगा जिसने आदेश पारित किया — ज़िला/अधीनस्थ न्यायालय का "प्रतिलिपि अनुभाग" या "copying agency/section", उच्च न्यायालय का copy/certified-copy section। चरण इस प्रकार हैं:

  1. प्रतिलिपि-आवेदन फॉर्म (copy application / नकल आवेदन) भरें — इसमें केस/मुकदमा नंबर, वर्ष, पक्षकारों के नाम, जिस दस्तावेज़ की प्रति चाहिए (निर्णय/अंतिम आदेश/आदेश-पत्रक/डिक्री) और उसकी तारीख लिखें।
  2. साधारण या अर्जेंट (urgent/tatkal) में से चुनें — अर्जेंट में शुल्क अधिक लेकिन प्रति जल्दी।
  3. शुल्क जमा करें — प्रायः कोर्ट-फीस स्टाम्प, प्रतिलिपि-स्टाम्प (folio) या ऑनलाइन चालान के रूप में; पुराने/दाखिल-दफ़्तर रिकॉर्ड के लिए अतिरिक्त खोज (search) शुल्क।
  4. पावती (token/receipt) लें जिस पर तैयार होने की संभावित तारीख होती है।
  5. तैयार होने पर प्रति लें — काउंटर से, डाक से, या ऑनलाइन डिजिटल-हस्ताक्षरित PDF के रूप में।

अधिवक्ता के माध्यम से आवेदन करने पर प्रायः वकालतनामा या प्राधिकार संलग्न करना होता है। यदि आप स्वयं (party-in-person) आवेदन कर रहे हैं तो पहचान/पक्षकार होने का विवरण साथ रखें।

फीस कितनी लगती है

शुल्क हर राज्य के न्यायालय-शुल्क नियमों और प्रत्येक उच्च न्यायालय के नकल-नियमों (copying rules) के अनुसार अलग-अलग है, इसलिए नीचे दी गई राशियाँ केवल सामान्य मार्गदर्शन हैं — अपने न्यायालय की प्रतिलिपि शाखा से वर्तमान दर अवश्य पुष्टि करें।

मद सामान्य सीमा (लगभग)
प्रति पृष्ठ प्रतिलिपि (copying) शुल्क — साधारण ₹2 – ₹10 प्रति पृष्ठ
अर्जेंट/tatkal अधिभार साधारण से अधिक (कई गुना तक)
खोज (search) शुल्क — पुराने/निस्तारित रिकॉर्ड प्रति रिकॉर्ड अतिरिक्त
आवेदन/फॉर्म शुल्क मामूली (कुछ रुपये)

एक उदाहरण के रूप में, कुछ पुराने उच्च-न्यायालय नियमों में प्रति पृष्ठ नाममात्र शुल्क कोर्ट-फीस स्टाम्प के रूप में अग्रिम जमा करना होता था; ये दरें समय-समय पर संशोधित होती हैं। सही गणना के लिए हमारे कोर्ट फीस की गणना वाली गाइड भी देखें, क्योंकि अपील/निष्पादन दायर करते समय अलग से कोर्ट-फीस भी लगेगी।

कितना समय लगता है — साधारण बनाम अर्जेंट

यदि अपील की समय-सीमा निकट है तो हमेशा अर्जेंट प्रति के लिए आवेदन करें और आवेदन की तारीख़-पावती सुरक्षित रखें — आगे बताई गई धारा 12 की गणना में यही तारीख़ निर्णायक होती है।

eCourts / ऑनलाइन प्रमाणित प्रति

अब कई न्यायालयों में प्रमाणित प्रति के लिए ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का अपना ई-कॉपींग/ई-प्रति पोर्टल (registry/e-filing) है, और कई उच्च न्यायालयों ने eCourts और अपने स्वयं के पोर्टल पर यह सुविधा शुरू की है, जहाँ डिजिटली हस्ताक्षरित प्रमाणित प्रति डाउनलोड हो जाती है। उपलब्धता न्यायालय-दर-न्यायालय अलग है, इसलिए संबंधित उच्च न्यायालय/ज़िला न्यायालय की वेबसाइट देखें। जहाँ ऑनलाइन सुविधा नहीं है, वहाँ प्रतिलिपि अनुभाग का काउंटर ही मुख्य रास्ता है।

अपील की समय-सीमा प्रमाणित प्रति से क्यों जुड़ी है — Limitation Act धारा 12

यह इस पूरे विषय का सबसे ज़रूरी बिंदु है, और जहाँ जूनियर सबसे ज़्यादा घबराते हैं।

परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 12(2) के अनुसार, अपील/पुनरीक्षण/पुनर्विलोकन की समय-सीमा गिनते समय वह दिन जिस दिन निर्णय सुनाया गया और "प्रमाणित प्रति प्राप्त करने में लगा अपेक्षित समय" (time requisite for obtaining a copy) — दोनों घटाए (excluded) जाते हैं।

अर्थात्, अपील की अवधि (जैसे ज़िला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध प्रथम अपील के लिए प्रायः 30/90 दिन) केवल कैलेंडर से नहीं गिनी जाती — निर्णय की तारीख़ और प्रमाणित प्रति तैयार होने में लगा समय हटा दिया जाता है। इसीलिए प्रमाणित प्रति के लिए जल्दी आवेदन करना और पावती की तारीख़ रखना अनिवार्य है — वही तारीख़ तय करती है कि आपको समय का लाभ कहाँ से मिलेगा।

इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट ने Jagat Dhish Bhargava बनाम Jawahar Lal Bhargava, AIR 1961 SC 832 में स्पष्ट किया: प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करने के बाद डिक्री तैयार होने में लगा समय भी धारा 12(2) के "अपेक्षित समय" में गिना जाता है, और न्यायालय द्वारा समय पर डिक्री न तैयार करने से पक्षकार का अपील-अधिकार समाप्त नहीं हो सकता।

इसी तर्क को संहिताबद्ध करते हुए CPC का Order 20 Rule 6A कहता है कि डिक्री निर्णय के 15 दिनों के भीतर तैयार होनी चाहिए; और यदि डिक्री समय पर तैयार न हो, तो पक्षकार डिक्री की प्रति के बिना भी अपील दायर कर सकता है (निर्णय की प्रति संलग्न करके)। इसलिए डिक्री/आदेश तैयार होने की देरी अपील दाख़िल करने में बाधा नहीं बननी चाहिए।

यदि आपके विरुद्ध एकपक्षीय निर्णय हुआ है और आप उसे चुनौती देना चाहते हैं, तो एकपक्षीय (ex-parte) डिक्री रद्द कराने की प्रक्रिया (Order 9 Rule 13 CPC) भी देखें — वहाँ भी समय-सीमा की गणना में प्रमाणित प्रति की भूमिका रहती है। अपील से पहले प्रतिपक्ष की कार्रवाई रोकने के लिए कैविएट याचिका (Section 148A CPC) दायर करने की गाइड उपयोगी हो सकती है।

निष्पादन (execution) के लिए प्रमाणित प्रति

यदि आप केस "जीत" गए हैं पर दूसरा पक्ष आदेश का पालन/भुगतान नहीं कर रहा, तो आपको डिक्री की प्रमाणित प्रति संलग्न करके निष्पादन याचिका दायर करनी होगी। कैसे, यह हमारी मनी-डिक्री के निष्पादन (Order 21 CPC) और 12-वर्ष की समय-सीमा वाली गाइड में विस्तार से है।

आपराधिक मामलों में — अभियुक्त को मुफ़्त प्रति

आपराधिक मामलों में प्रति के नियम अलग व उदार हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 392(4) के अनुसार निर्णय सुनाए जाने पर निर्णय की प्रति पक्षकारों/अधिवक्ताओं को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी, और यथासंभव सात दिनों के भीतर न्यायालय के पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। जहाँ अभियुक्त को कारावास की सज़ा हुई है और निर्णय अपील-योग्य है, वहाँ धारा 404 BNSS के तहत अभियुक्त को उसकी भाषा में प्रमाणित प्रति बिना विलंब, निःशुल्क दी जाती है (पूर्व CrPC धारा 363 के समान)।

कौन-कौन सी जानकारी/दस्तावेज़ तैयार रखें

आम गलतियाँ जिनसे बचें

Urava कैसे मदद करता है

Urava आपके द्वारा दिए गए प्रश्न या अपलोड किए गए दस्तावेज़ (मलयालम/हिंदी/अंग्रेज़ी स्कैन सहित) से लगभग 10 मिनट में एक कोर्ट-तैयार, उद्धरण-सहित (citation-backed) शोध-ज्ञापन (research memo) PDF बनाता है — जिसमें लागू धारा, समय-सीमा और सम्बद्ध न्यायिक निर्णय जाँचे जाते हैं। जब आप प्रमाणित प्रति हाथ में लेकर अपील/निष्पादन की तैयारी करें, Urava आपको लागू limitation (धारा 12 सहित) और प्रासंगिक मिसालें तेज़ी से सत्यापित करके देता है, ताकि कोई समय-सीमा चूके नहीं। WhatsApp पर उपलब्ध; नि:शुल्क 3 शोध के साथ शुरू करें — urava.app/register पर रजिस्टर करें।

Frequently Asked Questions

प्रमाणित प्रति और साधारण फोटोकॉपी में क्या फर्क है?

प्रमाणित प्रति पर न्यायालय की मुहर, प्रतिलिपि-अधिकारी के हस्ताक्षर और "सही प्रति" का प्रमाण-पत्र होता है, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 76 के तहत यही न्यायालय में मूल की विषय-वस्तु सिद्ध करने के लिए स्वीकार्य है। साधारण फोटोकॉपी या वेबसाइट-प्रिंटआउट अपील, निष्पादन या साक्ष्य के लिए मान्य नहीं होते।

प्रमाणित प्रति के लिए कितनी फीस और कितना समय लगता है?

प्रतिलिपि शुल्क प्रायः ₹2–₹10 प्रति पृष्ठ होता है, पुराने रिकॉर्ड पर खोज-शुल्क अलग, और अर्जेंट/tatkal में अधिभार लगता है; सटीक दर हर राज्य/उच्च न्यायालय के नियमों पर निर्भर है। साधारण प्रति कुछ दिनों से एक-दो सप्ताह में, जबकि अर्जेंट प्रति प्रायः उसी या अगले दिन मिल जाती है।

क्या अपील की 30/90 दिन की अवधि निर्णय की तारीख़ से गिनी जाती है?

नहीं, पूरी तरह नहीं। परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 12(2) के अनुसार निर्णय सुनाए जाने का दिन और प्रमाणित प्रति प्राप्त करने में लगा अपेक्षित समय अपील की अवधि में से घटा दिया जाता है। इसलिए जल्दी आवेदन करें और आवेदन की तारीख़-पावती सुरक्षित रखें।

क्या डिक्री/आदेश की प्रति तैयार न होने पर अपील रुक जाएगी?

नहीं। CPC के Order 20 Rule 6A के अनुसार डिक्री 15 दिनों में तैयार होनी चाहिए, और यदि समय पर न बने तो पक्षकार निर्णय की प्रति संलग्न कर डिक्री की प्रति के बिना भी अपील दायर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट (Jagat Dhish Bhargava, AIR 1961 SC 832) ने भी कहा कि न्यायालय की देरी से अपील-अधिकार समाप्त नहीं होता।

आपराधिक मामले में अभियुक्त को निर्णय की प्रति के लिए पैसे देने होते हैं?

नहीं। BNSS 2023 की धारा 392(4) के तहत निर्णय की प्रति पक्षकारों को निःशुल्क दी जाती है और यथासंभव सात दिनों में पोर्टल पर अपलोड होती है; और कारावास की सज़ा व अपील-योग्य मामले में धारा 404 BNSS के तहत अभियुक्त को उसकी भाषा में प्रमाणित प्रति बिना विलंब मुफ़्त दी जाती है।

ऑनलाइन प्रमाणित प्रति कैसे मिलती है?

सुप्रीम कोर्ट व कई उच्च न्यायालयों के पोर्टल और eCourts पर प्रमाणित प्रति के लिए ऑनलाइन आवेदन कर डिजिटली हस्ताक्षरित PDF डाउनलोड की जा सकती है। यह सुविधा हर न्यायालय में अलग-अलग है, इसलिए संबंधित न्यायालय की वेबसाइट देखें; जहाँ उपलब्ध नहीं, वहाँ प्रतिलिपि अनुभाग का काउंटर ही रास्ता है।

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