IPC की धारा अब BNS में कौन सी है? ड्राफ्टिंग से पहले 'सही व चालू' धारा — पूरी रूपांतरण टेबल और 'अपराध की तारीख' का नियम (2026 हिंदी गाइड)
1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता (IPC, 1860) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू है — इसलिए नए मामलों में धारा 420 (धोखाधड़ी) अब BNS की धारा 318 है, धारा 302 (हत्या) अब धारा 103 है, और धारा 498A (क्रूरता) अब धारा 85 है। पर सबसे ज़रूरी नियम इससे भी आगे है: कौन सा कानून लागू होगा यह इस बात से तय होता है कि अपराध किस तारीख को हुआ, न कि FIR या केस कब दर्ज हुआ — 1 जुलाई 2024 से पहले हुआ अपराध आज भी IPC/CrPC के तहत ही चलेगा, भले FIR बाद में लिखी गई हो।
मुख्य परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) 2023 वे तीन नए आपराधिक कानून हैं जिन्होंने 1 जुलाई 2024 से क्रमशः IPC 1860, CrPC 1973 और Indian Evidence Act 1872 की जगह ले ली — नंबर पूरी तरह बदल गए, इसलिए कोई भी पुरानी धारा नए कोड में उसी नंबर पर नहीं है।
यह पेज तीनों कोड की रूपांतरण (conversion) टेबल, वह एक नियम जो हर ड्राफ्ट में सबसे ज़्यादा गलत होता है, और नोटिस/याचिका दाखिल करने से पहले 'चालू धारा' पक्की करने की 5-स्टेप चेकलिस्ट देता है। सारे नंबर indiacode.nic.in (सरकार का आधिकारिक बेयर-एक्ट पोर्टल) पर दोबारा मिलान करके ही अंतिम रूप दें — सब-सेक्शन (जैसे 318 बनाम 318(4)) मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।
सबसे बड़ा नियम: 'अपराध की तारीख' तय करती है कि IPC लगेगी या BNS
कौन सा कोड लागू होगा यह अपराध होने की तारीख से तय होता है, FIR या ट्रायल की तारीख से नहीं। BNSS की धारा 531 (निरसन एवं व्यावृत्ति/repeal & savings) साफ़ रखती है कि 1 जुलाई 2024 से पहले शुरू हुई जाँच, ट्रायल और अपील पुराने CrPC के तहत ही चलती रहेंगी; इसी तरह पहले हुए अपराध पर IPC ही लगेगी। इसका आधार General Clauses Act, 1897 की धारा 6 और संविधान के अनुच्छेद 20(1) (किसी को उस कानून के तहत सज़ा नहीं जो अपराध के समय लागू ही नहीं था) में है।
ड्राफ्ट करते समय यह टेबल दिमाग़ में रखें:
| स्थिति | कौन सा कोड लगेगा |
|---|---|
| अपराध 30 जून 2024 या उससे पहले हुआ | IPC 1860 + CrPC 1973 (FIR चाहे बाद में लिखे) |
| अपराध 1 जुलाई 2024 या उसके बाद हुआ | BNS 2023 + BNSS 2023 |
| पुराना केस पहले से चल रहा है | उसी पुराने कोड में चलेगा (BNSS s.531) |
| प्रक्रिया संबंधी कदम आज उठ रहा है (जैसे नई अपील/जमानत अर्जी) | प्रक्रिया BNSS के तहत, पर मूल अपराध की धारा नहीं बदलेगी |
इसलिए 2026 में भी बहुत सारी FIR और चार्जशीट सही तरीके से IPC में ही होंगी — पुरानी धारा दिखना अपने आप गलती नहीं है। गलती तब है जब नए (1 जुलाई 2024 के बाद के) अपराध के लिए ड्राफ्ट में IPC की धारा घसीट दी जाए।
तीन नए कोड एक नज़र में (आंकड़े + आधिकारिक स्रोत)
| पुराना कानून | नया कानून (2023) | धाराओं की संख्या | लागू |
|---|---|---|---|
| Indian Penal Code, 1860 (IPC) — 511 धाराएँ | भारतीय न्याय संहिता (BNS) — indiacode.nic.in | 358 धाराएँ | 1 जुलाई 2024 |
| Code of Criminal Procedure, 1973 (CrPC) — 484 धाराएँ | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) | 531 धाराएँ | 1 जुलाई 2024 |
| Indian Evidence Act, 1872 (IEA) — 167 धाराएँ | भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) | 170 धाराएँ | 1 जुलाई 2024 |
संक्षेप में: IPC की 511 धाराएँ घटकर BNS में 358 रह गईं, CrPC की 484 बढ़कर BNSS में 531 हो गईं, और Evidence Act की 167 धाराएँ BSA में 170 हुईं — यानी हर धारा का नंबर नए सिरे से दिया गया है, कोई सीधा 'वही नंबर' नहीं बचा।
IPC → BNS: सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली धाराओं की रूपांतरण टेबल
नीचे वे धाराएँ हैं जो जूनियर एडवोकेट और लिटिगेंट रोज़ ड्राफ्ट में लिखते हैं। सब-सेक्शन indiacode पर मिलान कर लें।
| पुरानी IPC धारा (अपराध) | नई BNS धारा |
|---|---|
| 302 — हत्या (murder) | 103 |
| 304 — गैर-इरादतन हत्या | 105 |
| 304A — लापरवाही से मृत्यु | 106 |
| 304B — दहेज मृत्यु | 80 |
| 306 — आत्महत्या के लिए उकसाना | 108 |
| 307 — हत्या का प्रयास | 109 |
| 323 — जान-बूझकर चोट | 115 |
| 324 — हथियार से चोट | 118 |
| 325 — गंभीर चोट | 117 |
| 354 — महिला की लज्जा भंग | 74 |
| 354A — यौन उत्पीड़न | 75 |
| 354D — पीछा करना (stalking) | 78 |
| 376 — बलात्कार | 64 |
| 379 — चोरी | 303 |
| 380 — घर में चोरी | 305 |
| 392 — लूट (robbery) | 309 |
| 406 — आपराधिक न्यासभंग | 316 |
| 420 — धोखाधड़ी/छल | 318 (गंभीर रूप 318(4)) |
| 447 — आपराधिक अतिक्रमण | 329 |
| 448 — गृह-अतिक्रमण | 329 |
| 498A — पति/रिश्तेदार द्वारा क्रूरता | 85 (और परिभाषा 86) |
| 499/500 — मानहानि | 356 |
| 506 — आपराधिक धमकी | 351 |
| 509 — शब्द/इशारे से लज्जा भंग | 79 |
| 34 — सामान्य आशय | 3(5) |
| 120B — आपराधिक षड्यंत्र | 61 |
| 149 — विधिविरुद्ध जमाव का सामान्य उद्देश्य | 190 |
मानहानि के आपराधिक नोटिस का ड्राफ्ट अब BNS धारा 356 पर आधारित होगा — इसका फॉर्मेट और प्रक्रिया मानहानि का कानूनी नोटिस कैसे भेजें (BNS 356) पेज पर विस्तार से है।
CrPC → BNSS: प्रक्रिया की मुख्य धाराएँ (FIR, नोटिस, जमानत, कॉग्निजेंस)
| पुरानी CrPC धारा | नई BNSS धारा | विषय |
|---|---|---|
| 154 | 173 | संज्ञेय अपराध की FIR |
| 156(3) | 175(3) | मजिस्ट्रेट द्वारा FIR/जाँच का आदेश |
| 41A | 35(3) | गिरफ्तारी से पहले नोटिस |
| 161 | 180 | गवाह के बयान |
| 164 | 183 | मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान |
| 167 | 187 | रिमांड व डिफ़ॉल्ट जमानत (60/90 दिन) |
| 173 | 193 | चार्जशीट/फाइनल रिपोर्ट |
| 190 | 210 | संज्ञान (cognizance) |
| 200 | 223 | परिवाद (complaint case) |
| 437 / 439 | 480 / 483 | नियमित (regular) जमानत |
| 438 | 482 | अग्रिम जमानत (anticipatory bail) |
| 482 | 528 | उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ (FIR रद्द) |
| 125 | 144 | पत्नी/बच्चों/माता-पिता का भरण-पोषण |
| 320 | 359 | अपराधों का समझौता (compounding) |
याद रखने वाली अदला-बदली: अग्रिम जमानत CrPC 438 से BNSS 482 हो गई, जबकि पुरानी 'अंतर्निहित शक्ति' वाली CrPC 482 अब BNSS 528 है — दोनों नंबर आपस में उलट-से लगते हैं, यहीं सबसे ज़्यादा गलती होती है। अग्रिम जमानत याचिका का पूरा ड्राफ्ट-ढाँचा BNSS 482 अग्रिम जमानत याचिका (हिंदी) पर, FIR रद्द कराने की 528 याचिका BNSS 528 FIR क्वैश पिटीशन (हिंदी) पर, और पुलिस FIR न लिखे तो 175(3) का रास्ता पुलिस FIR न करे तो क्या करें — BNSS 175(3) पर देखें।
Evidence Act → BSA: सबूत की मुख्य धाराएँ
| पुरानी IEA धारा | नई BSA धारा | विषय |
|---|---|---|
| 65B | 63 | इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (WhatsApp/CCTV) का प्रमाणपत्र |
| 25 / 26 | 23 | पुलिस के समक्ष इक़बालिया बयान अस्वीकार्य |
| 32 | 26 | मृत्युकालिक कथन (dying declaration) |
| 45 | 39 | विशेषज्ञ की राय |
इलेक्ट्रॉनिक सबूत के लिए अब BSA धारा 63 का प्रमाणपत्र (पुराना 65B) लगाना अनिवार्य है — डिजिटल रिकॉर्ड बिना इस सर्टिफ़िकेट के आमतौर पर अस्वीकार्य होता है।
कौन सी पुरानी धाराएँ अब खत्म या बदल गई हैं (कोई सीधा समकक्ष नहीं)
कुछ IPC धाराओं का BNS में कोई सीधा नंबर नहीं है — इन्हें ड्राफ्ट में डालना सीधे गलती होगी:
- धारा 497 (व्यभिचार/adultery): पूरी तरह हटा दी गई (Joseph Shine v. Union of India, (2019) 3 SCC 39 में असंवैधानिक घोषित) — BNS में कोई समकक्ष नहीं।
- धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध): BNS में शामिल नहीं की गई; इसका कोई सीधा प्रतिस्थापन नहीं है।
- धारा 124A (राजद्रोह/sedition): समाप्त; उसकी जगह अलग-भाषा वाली BNS धारा 152 (भारत की संप्रभुता/एकता को ख़तरे में डालने वाले कृत्य) आई है — यह पुरानी 124A की नकल नहीं, नया व व्यापक प्रावधान है।
साथ ही BNS ने कुछ नए अपराध जोड़े हैं जिनका IPC में नंबर था ही नहीं — जैसे संगठित अपराध (109/111), आतंकवाद (113), मॉब-लिंचिंग (103(2)), और झपटमारी/snatching (304) — और सज़ा के रूप में सामुदायिक सेवा (community service) पहली बार जोड़ी गई है।
अगर FIR/चार्जशीट/ड्राफ्ट में गलत धारा लग जाए — केस रद्द हो जाएगा?
सिर्फ़ गलत नंबर से केस अपने-आप रद्द नहीं होता। अदालत तथ्यों (आरोप के सार) को देखती है, महज़ लेबल को नहीं — गलत या छूटी हुई धारा को ट्रायल के दौरान ठीक/जोड़ा जा सकता है (BNSS की धारा 239 के तहत आरोप में संशोधन)। लेकिन व्यवहार में गलत कोड की धारा से जमानत के तर्क, जमानती/गैर-जमानती वर्गीकरण, और सज़ा की अधिकतम सीमा पर बहस उलझ जाती है, विरोधी पक्ष को तकनीकी मौका मिल जाता है, और नोटिस/याचिका कमज़ोर दिखती है। इसीलिए ड्राफ्ट में पहले दिन से चालू धारा लिखना सबसे सुरक्षित है।
जमानत, लिमिटेशन और सज़ा — क्या नंबर बदलने से प्रावधान भी बदले?
कई जगह सिर्फ़ नंबर बदला है, प्रावधान वही है (जैसे डिफ़ॉल्ट जमानत की 60/90 दिन सीमा CrPC 167 से BNSS 187 में लगभग ज्यों-की-त्यों)। पर कुछ जगह सारवान बदलाव भी हुए — जैसे पुलिस हिरासत की गणना और जमानत की कुछ शर्तें BNSS में नए ढंग से लिखी गई हैं। इसलिए 'नंबर बदला = बाकी सब वही' मानकर मत चलिए; हर बार मूल धारा की भाषा indiacode.nic.in पर पढ़ लीजिए।
ड्राफ्टिंग से पहले 'सही व चालू' धारा पक्की करने की 5-स्टेप चेकलिस्ट
- अपराध की तारीख तय करें: 1 जुलाई 2024 से पहले = IPC/CrPC; बाद = BNS/BNSS। यही सबसे पहला फ़िल्टर है।
- अपराध का सार पहचानें, नंबर नहीं: पहले तय करें कि कृत्य 'धोखाधड़ी' है या 'न्यासभंग', फिर सही धारा चुनें — मसल-मेमोरी वाला पुराना नंबर मत घसीटें।
- आधिकारिक बेयर-एक्ट से मिलान करें: चुनी हुई BNS/BNSS धारा को indiacode.nic.in पर पढ़कर सब-सेक्शन (जैसे 318 बनाम 318(4)) पक्का करें।
- 'हटी हुई' सूची जाँचें: देख लें कि आप जिस पुराने प्रावधान पर टिके हैं (497/377/124A) वह अब मौजूद भी है या नहीं।
- प्रक्रिया-धारा अलग से जोड़ें: मूल अपराध (BNS) और प्रक्रिया (BNSS — जमानत, नोटिस, कॉग्निजेंस) दोनों की चालू धारा साथ लिखें।
Urava कैसे मदद करता है
Urava एक AI लीगल-रिसर्च टूल है जो टाइप किए गए सवाल या स्कैन किए गए (हिंदी/मलयालम/अंग्रेज़ी) दस्तावेज़ से ~10 मिनट में कोर्ट-रेडी, केस-सिटेशन सहित रिसर्च मेमो (PDF) बनाता है — WhatsApp पर ही। ड्राफ्ट या मेमो तैयार करते समय यह पुरानी IPC/CrPC धारा को उसकी चालू BNS/BNSS धारा से मिलाकर फ़्लैग करता है, यह बताता है कि अपराध की तारीख के हिसाब से कौन सा कोड लागू है, और हर सिटेशन का स्रोत दिखाता है ताकि आप फाइल करने से पहले भरोसा कर सकें। फ्री टियर में 3 रिसर्च मुफ़्त — urava.app/register पर शुरू करें। (AI द्वारा सुझाई हर धारा व केस को दाखिल करने से पहले खुद verify करना ज़रूरी है — AI से कानूनी शोध कैसे करें पेज इसका तरीका बताता है।)
Frequently Asked Questions
क्या IPC 420 अब पूरी तरह खत्म हो गई है?
नए (1 जुलाई 2024 के बाद के) अपराधों के लिए धोखाधड़ी अब BNS की धारा 318 है, और गंभीर रूप 318(4) — यानी नए मामलों में IPC 420 नहीं लगेगी। लेकिन 1 जुलाई 2024 से पहले हुए धोखाधड़ी के मामले आज भी IPC 420 के तहत ही चलेंगे, चाहे FIR बाद में दर्ज हुई हो।
IPC की कौन सी धारा BNS में उसी नंबर पर है?
कोई भी नहीं। IPC की 511 धाराओं को नए सिरे से क्रमबद्ध करके BNS की 358 धाराओं में रखा गया है, इसलिए हर धारा का नंबर बदल गया है। किसी भी पुराने नंबर को नए नंबर से मानकर मत चलिए — हमेशा रूपांतरण टेबल या indiacode.nic.in से मिलान करें।
CrPC 438 (अग्रिम जमानत) अब कौन सी धारा है?
अग्रिम जमानत अब BNSS की धारा 482 है (पुरानी CrPC 438)। ध्यान रहे कि पुरानी CrPC 482 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ, FIR रद्द) अब BNSS 528 है — ये दोनों नंबर आपस में उलट जाते हैं, इसलिए ड्राफ्ट में सावधानी रखें।
1 जुलाई 2024 से पहले हुआ अपराध किस कानून के तहत चलेगा?
अपराध की तारीख से तय होता है, FIR या ट्रायल की तारीख से नहीं। 30 जून 2024 या उससे पहले हुआ अपराध IPC/CrPC के तहत ही चलेगा (BNSS धारा 531 और अनुच्छेद 20(1) के कारण), भले ही FIR या मुक़दमा 2026 में शुरू हो।
BNS, BNSS और BSA में क्या फर्क है?
BNS (भारतीय न्याय संहिता) अपराध और सज़ा को परिभाषित करता है (पुराना IPC); BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) प्रक्रिया तय करता है — FIR, गिरफ्तारी, जमानत, ट्रायल (पुराना CrPC); और BSA (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) सबूत के नियम देता है (पुराना Evidence Act)। तीनों 1 जुलाई 2024 से लागू हैं।
गलत या पुरानी धारा लिखने से केस कमज़ोर होता है क्या?
सिर्फ़ गलत नंबर से केस रद्द नहीं होता क्योंकि अदालत तथ्यों को देखती है, पर व्यवहार में गलत कोड से जमानत, वर्गीकरण और सज़ा की सीमा पर बहस उलझती है और विरोधी पक्ष को तकनीकी मौका मिलता है। इसलिए ड्राफ्ट में शुरू से ही चालू (current) धारा लिखना सबसे सुरक्षित है।