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उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) के लिए कोर्ट में आवेदन कैसे करें — कौन सी अदालत (धारा 371), प्रक्रिया, कोर्ट फीस (2–3% ad valorem, Article 12), ज़रूरी दस्तावेज़, कितना समय, और यह ज़मीन-मकान पर क्यों लागू नहीं होता (2026 हिंदी गाइड)

14 October 2026 · Urava Research Desk

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) के लिए कोर्ट में आवेदन कैसे करें — कौन सी अदालत (धारा 371), प्रक्रिया, कोर्ट फीस (2–3% ad valorem, Article 12), ज़रूरी दस्तावेज़, कितना समय, और यह ज़मीन‑मकान पर क्यों लागू नहीं होता (2026 हिंदी गाइड)

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (succession certificate) के लिए आवेदन उस जिला न्यायालय (District Judge) में दायर किया जाता है जहाँ मृतक अपनी मृत्यु के समय सामान्यतः रहता था, या जहाँ उसकी संपत्ति स्थित है (Indian Succession Act 1925, धारा 371)। आवेदन धारा 372 के तहत एक प्लेंट (plaint) की तरह सत्यापित (verified) याचिका के रूप में दिया जाता है, कोर्ट फीस चुकाई जाती है, अखबार में सार्वजनिक नोटिस के ज़रिए आपत्तियाँ माँगी जाती हैं, और आपत्ति न आने पर सामान्यतः 3–6 महीने में प्रमाण पत्र जारी हो जाता है। ध्यान दें: यह प्रमाण पत्र केवल मृतक के बैंक बैलेंस, FD, शेयर, बॉन्ड जैसे ऋणों (debts) और प्रतिभूतियों (securities) के लिए है — ज़मीन या मकान जैसी अचल संपत्ति (immovable property) पर यह लागू नहीं होता।

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र एक अदालती दस्तावेज़ है जो बिना वसीयत (intestate) मरे व्यक्ति के कानूनी वारिस को उसके ऋणों और चल प्रतिभूतियों को वसूलने तथा उन पर वैध रूप से कार्य करने का अधिकार देता है। इसका पूरा कानूनी ढाँचा Indian Succession Act 1925 के Part X (धारा 370 से 390) में दिया गया है।

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र किस चीज़ के लिए है — और किसके लिए नहीं

सबसे पहले यही साफ़ कर लें, क्योंकि यहीं सबसे ज़्यादा लोग गलती करते हैं और गलत अदालत में समय गँवाते हैं।

यह प्रमाण पत्र केवल "debts and securities" (ऋण और प्रतिभूतियाँ) के लिए मिलता है — यानी चल (movable) वित्तीय संपत्ति, जैसे:

धारा 370 में "security" की परिभाषा में सरकारी प्रतिभूतियाँ, कंपनी के स्टॉक/शेयर/डिबेंचर आदि शामिल हैं। इसमें ज़मीन, मकान, फ्लैट या दुकान जैसी अचल संपत्ति शामिल नहीं है। अचल संपत्ति के लिए आपको legal heir certificate, नगर‑निगम/राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन (नामांतरण), और विवाद होने पर बँटवारे का मुकदमा (partition suit) चाहिए होता है — succession certificate नहीं। अगर हिस्सेदारी को लेकर वारिसों में विवाद है तो देखें बँटवारे के मुकदमे में फाइनल डिक्री और सीमा (Order 20 Rule 18 CPC)।

इसी तरह, अगर मृतक ने वसीयत (will) छोड़ी है, तो succession certificate नहीं — बल्कि प्रोबेट (probate) या letters of administration की ज़रूरत पड़ती है (धारा 370 स्पष्ट करती है कि जहाँ probate/letters of administration ज़रूरी हैं, वहाँ certificate नहीं मिलेगा)।

कौन आवेदन कर सकता है

बिना वसीयत मरे व्यक्ति का कोई भी कानूनी वारिस या हकदार व्यक्ति आवेदन कर सकता है — जैसे पति/पत्नी, बच्चे, माता‑पिता। एक से अधिक वारिस होने पर आम तौर पर एक वारिस आवेदन करता है और बाकी वारिस NOC / सहमति हलफनामा (affidavit) देते हैं, या सभी संयुक्त रूप से आवेदन कर सकते हैं।

कौन सी अदालत — क्षेत्राधिकार (धारा 371)

आवेदन उस जिला न्यायालय में होता है जिसकी सीमा में मृतक मृत्यु के समय सामान्यतः निवास करता था; यदि कोई निश्चित निवास स्थान न हो, तो उस जिले में जहाँ मृतक की कोई संपत्ति स्थित हो (धारा 371)। व्यवहार में यह अधिकार जिला न्यायाधीश (District Judge) को, और कई राज्यों में अधिसूचना द्वारा सिविल जज (सीनियर डिवीज़न) को भी दिया गया है। सही जिला/अदालत की पुष्टि अपने ज़िले की e‑Courts वेबसाइट या स्थानीय वकील से कर लें।

ज़रूरी दस्तावेज़ — चेकलिस्ट

दस्तावेज़ किसलिए
मृतक का मृत्यु प्रमाण पत्र (death certificate) मृत्यु की तारीख और तथ्य साबित करने के लिए
सभी कानूनी वारिसों की सूची (नाम, पता, रिश्ता, उम्र) धारा 372 की अनिवार्य जानकारी
ऋण व प्रतिभूतियों का विवरण (बैंक, FD, शेयर, राशि) certificate में क्या‑क्या शामिल होगा, यही तय करता है
आवेदक का पहचान व पते का प्रमाण (आधार/पासपोर्ट आदि) सत्यापन
अन्य वारिसों के NOC / सहमति हलफनामे विवाद टालने और प्रक्रिया तेज़ करने के लिए
कोर्ट फीस (judicial stamp के रूप में) धारा 372 आवेदन के साथ देय

धारा 372 के अनुसार आवेदन में मृत्यु का समय, मृतक का सामान्य निवास, वारिसों का विवरण और जिन ऋणों/प्रतिभूतियों के लिए प्रमाण पत्र चाहिए उनका ब्यौरा देना अनिवार्य है, और आवेदन को प्लेंट की तरह सत्यापित (verified) करना होता है।

प्रक्रिया — चरण‑दर‑चरण

  1. याचिका तैयार करें और दायर करें: धारा 372 के तहत सत्यापित याचिका में सभी अनिवार्य विवरण भरें, दस्तावेज़ लगाएँ और कोर्ट फीस जमा करें।
  2. कोर्ट नोटिस व सार्वजनिक नोटिस: संतुष्ट होने पर अदालत सुनवाई की तारीख तय करती है और आपत्तियाँ आमंत्रित करने के लिए संबंधित पक्षों को नोटिस तथा अखबार में सार्वजनिक नोटिस जारी करती है (धारा 373)। आपत्ति के लिए सामान्यतः लगभग 4–6 सप्ताह का समय मिलता है (सटीक अवधि कोर्ट/हाई कोर्ट नियमों पर निर्भर)।
  3. आपत्ति न आने पर: अदालत आवेदक के दावे की जाँच (verification) करती है।
  4. प्रमाण पत्र जारी: संतुष्ट होने पर अदालत प्रमाण पत्र दे देती है। धारा 373 के अनुसार, यदि अधिकार का प्रश्न किसी "समरी (summary)" कार्यवाही के लिए बहुत जटिल हो, तब भी अदालत उस व्यक्ति को प्रमाण पत्र दे सकती है जिसके पास prima facie सबसे अच्छा हक (best title) दिखता है।
  5. सुरक्षा (security): धारा 375 के तहत अदालत प्रमाण पत्र देने से पहले ग्रांटी से बॉन्ड/सिक्योरिटी माँग सकती है, ताकि दावेदारों के हित सुरक्षित रहें।

कोर्ट फीस कितनी — Article 12, Court Fees Act 1870

succession certificate पर कोर्ट फीस, Court Fees Act 1870 की Schedule I के Article 12 के तहत, प्रमाण पत्र में दर्शाए गए ऋण/प्रतिभूतियों के मूल्य पर ad valorem (मूल्य के अनुपात में) ली जाती है — मूल अधिनियम में यह लगभग 2% (कुछ मामलों में 3%) है। (ध्यान दें: Article 11 probate/letters of administration के लिए है, succession certificate के लिए Article 12 है।)

कई राज्यों ने इसे संशोधित कर स्लैब बना दिया है — उदाहरण के लिए पहले ₹10,000 पर 2%, अगले ₹40,000 पर 3%, और आगे बढ़ते हुए कुछ राज्यों में 7% तक। चूँकि court fee राज्य के Court Fees Act पर निर्भर करती है, इसलिए अपने राज्य की वर्तमान दर अवश्य जाँचें। एक राहत भी है: यदि बाद में उसी estate पर probate/letters of administration लिया जाए, तो पहले दी गई succession certificate फीस उसमें घटा दी जाती है (set‑off)।

फीस कैसे आँकी जाती है और ad valorem बनाम fixed का फर्क समझने के लिए देखें: भारत में कोर्ट फीस की गणना — ad valorem बनाम fixed, वाद मूल्यांकन और क्षेत्राधिकार। इसके अलावा वकील की फीस अलग होती है — बिना विवाद वाले सामान्य मामलों में यह प्रायः ₹5,000 से ₹25,000 के बीच रहती है (स्थान व जटिलता पर निर्भर)।

कितना समय लगता है

आवेदन के लिए कोई निश्चित limitation अवधि निर्धारित नहीं है — जब भी debts/securities वसूलने की ज़रूरत पड़े, आवेदन किया जा सकता है। हालाँकि यदि बात किसी वसूली‑वाद (recovery suit) तक पहुँचे तो वहाँ limitation लागू होती है; देखें वाद के लिए limitation — 3 साल या 12 साल, कौन सा Article लगेगा।

प्रमाण पत्र मिलने के बाद क्या होता है (धारा 381)

धारा 381 के अनुसार प्रमाण पत्र उन व्यक्तियों/संस्थाओं के विरुद्ध conclusive (निर्णायक) होता है जिन पर मृतक का ऋण या प्रतिभूति बकाया है, और सद्भावपूर्वक (good faith) प्रमाण पत्र‑धारक को भुगतान करने पर उन्हें पूर्ण indemnity (क्षतिपूर्ति संरक्षण) मिलता है। इसका व्यावहारिक मतलब — बैंक या कंपनी बिना किसी जोखिम के certificate‑धारक को राशि जारी कर सकती है।

यह अंतिम रूप से मालिकाना हक तय नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने Banarsi Dass बनाम Teeku Dutta, (2005) 4 SCC 449 में स्पष्ट किया कि succession certificate की कार्यवाही समरी (summary) प्रकृति की है, इसका उद्देश्य ऋण वसूली सुगम बनाना और भुगतान करने वाले को संरक्षण देना है; यह जटिल title/legitimacy विवादों का अंतिम निर्णय नहीं करती। धारा 387 भी कहती है कि यह बाद के किसी नियमित मुकदमे को बाधित नहीं करता, और धारा 383 में दी गई सीमित आधारों पर प्रमाण पत्र को revoke (निरस्त) भी किया जा सकता है।

वकील की ज़रूरत है या खुद कर सकते हैं?

यदि सभी वारिस सहमत हैं, estate सीधा‑सादा है और राशि कम है, तो स्थानीय मदद से आवेदन संभव है। लेकिन विवाद की संभावना हो, कई वारिस/राज्य शामिल हों, या बड़ी राशि हो, तो वकील लेना समझदारी है — क्योंकि धारा 372 की सत्यापन‑शर्तें, सही court fee valuation, और आपत्तियों का जवाब तकनीकी होते हैं, और छोटी‑सी चूक पर आवेदन में देरी होती है।

How Urava helps

Urava भारतीय कानून के लिए एक AI legal‑research सहायक है जो WhatsApp पर काम करता है। आप सीधे हिंदी, मलयालम या अंग्रेज़ी में सवाल पूछ सकते हैं — या मृत्यु प्रमाण पत्र/बैंक दस्तावेज़ की स्कैन कॉपी भेज सकते हैं (Sarvam OCR) — और ~10 मिनट में आपको citation‑सहित, कोर्ट‑रेडी रिसर्च मेमो (PDF) मिलता है: लागू धाराएँ (Indian Succession Act 1925 की धारा 371‑381, Court Fees Act Article 12), आपके राज्य की court‑fee दर जाँचने के बिंदु, दस्तावेज़ चेकलिस्ट और प्रासंगिक जजमेंट। हर citation को उद्धृत करने से पहले सत्यापित किया जाता है। मुफ़्त में 3 रिसर्च आज़माएँ — urava.app पर रजिस्टर करें।

Frequently Asked Questions

क्या उत्तराधिकार प्रमाण पत्र से ज़मीन या मकान ट्रांसफर हो सकता है?

नहीं। succession certificate केवल ऋणों और प्रतिभूतियों (बैंक बैलेंस, FD, शेयर, बॉन्ड आदि) के लिए है। ज़मीन‑मकान जैसी अचल संपत्ति के लिए legal heir certificate, राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन और विवाद होने पर partition suit या letters of administration की ज़रूरत होती है।

succession certificate के लिए कौन सी अदालत में आवेदन करें?

धारा 371 के अनुसार उस जिला न्यायालय (District Judge) में, जिसकी सीमा में मृतक मृत्यु के समय सामान्यतः रहता था। यदि निश्चित निवास न हो, तो उस जिले में जहाँ मृतक की संपत्ति स्थित है। कई राज्यों में यह अधिकार सिविल जज (सीनियर डिवीज़न) को भी दिया गया है।

कोर्ट फीस कितनी लगती है?

Court Fees Act 1870 की Schedule I के Article 12 के तहत प्रमाण पत्र में दर्शाए ऋण/प्रतिभूतियों के मूल्य पर ad valorem फीस — मूल रूप से लगभग 2% (कहीं 3%)। कई राज्यों में स्लैब प्रणाली है जो 7% तक जा सकती है, इसलिए अपने राज्य के Court Fees Act की वर्तमान दर जाँचें।

प्रमाण पत्र मिलने में कितना समय लगता है?

बिना विवाद वाले मामलों में सामान्यतः 3 से 6 महीने, जिसमें अखबार में सार्वजनिक नोटिस की अवधि शामिल है। यदि कोई वारिस आपत्ति करे तो मामला 1 से 3 साल तक खिंच सकता है। सभी वारिसों की सहमति (NOC) से प्रक्रिया सबसे तेज़ होती है।

क्या succession certificate अंतिम रूप से मालिकाना हक तय करता है?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने Banarsi Dass बनाम Teeku Dutta, (2005) 4 SCC 449 में कहा कि यह कार्यवाही समरी है और केवल prima facie हक के आधार पर ऋण वसूली सुगम बनाती है। धारा 387 के अनुसार यह बाद के नियमित मुकदमे को बाधित नहीं करता।

अगर मृतक ने वसीयत छोड़ी हो तो क्या succession certificate चाहिए?

नहीं। वसीयत होने पर प्रोबेट (probate) या letters of administration की ज़रूरत होती है, succession certificate की नहीं। धारा 370 स्पष्ट करती है कि जहाँ probate/letters of administration आवश्यक हैं, वहाँ certificate जारी नहीं किया जाता।

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